दिली मेरी दोस्त
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
जहाँ मैं हरदम घूमता था,
यारों के साथ चलता था
अब पत्थर की सड़कों ने,
रेत के महलों ने मेरे चलने के जगह छीन ली
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
जहाँ मेरे बचपन की आवाज़
गूंजा करती थी, मेरे मित्रो की
हंसी सुनाई देती थी,
अब कारों की गुंजन में,
हॉर्न की चीत्कार में उनकी आवाज़ खो गयी
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
जहाँ मेरे पडोसी, मेरे चाहने वाले नज़र आते थे
अब सिर्फ Parking Lot से बने Bridges और Bypass नज़र आते है
चाहने वालों की मोहबत अब traffic jam में सिमट गयी
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
जहाँ मैं बेझिजक गलियों
में भागता था,
अब उनीह गलियों में कार
से निकलते डरता हूँ,
मेरी डगर, मेरी मीटी Cement के Concrete में दफ़न हो गयी
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
जिन झरोकों की धुप में,
पड़ोस की लड़कियों से आखँ लड़ता था
उन पर अब काले मॆले शीशे
की दीवार लग गयी,
चेहरा अब Facebook की Profile बन गया, बातें अब सिरफ WhatsApp पर रह गयी
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
उस नुकड़ पर अपने लोगों के
साथ चाट खता था, देश की खबरें
सुनता था
अब McDonald और KFC में विदेश की
बात होती है,
उस Burger से चाट की मात हो गयी
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयी
वक़्त की दौड़ में,
तरकी के दोर में,
मेरी दिली अब बदल गयी
दिली दिलोवालों की नहीं, अब पैसेवालों की बन गयी
दिली मेरी दोस्त, तू कहाँ
गयीAuthor's note:- This is based on my recent trip to Delhi, a city I spent all my life in India and I loved a lot. But it has changed a lot now.
